रजा की फिल्म 'जुल्मतों के दौर में' (लिंक देखें) दिखाती है कि फासीवाद आखिर जन्म कैसे लेता है। इस फिल्म में दूसरे विश्वयुद्ध के पहले के जर्मनी में बेरोजगारी और विश्वव्यापी मन्दी के दौर में हिटलर के फासीवादी कुप्रचार द्वारा यहूदियों, कम्युनिस्टों और तमाम इंसाफपसन्द बुद्धिजीवियों को जर्मनी की तंगहाली का कारण बताकर उनके सफाये और फासीवाद के उभार को दिखाया गया है। इस फिल्म के दृश्य उस दौर के सिहरा देने वाले और इस सबके खिलाफ गहरे गुस्से पैदा करने वाली तस्वीरे पेश करते हैं।आज के दौर में यह फिल्म बेहद प्रासंगिक है क्योंकि एक ओर विश्वव्यापी मन्दी बड़े पैमाने पर बेरोजगारी और गरीबी के भयावह दुष्चक्र को लाने की तैयारी कर रही है दूसरी ओर हमारे देश में फासीवाद की अवतार आरएसएस हिन्दुत्व की नई प्रयोगशालाओं की जमीनी तैयारी गुपचुप तरीके से बड़े पैमाने पर कर रहे हैं। चुनावी हार से उनके अभियान में रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता। समाज में नफरत फैलाने के अपने अभियान में लगे ये संगठन हिटलर के दौर को वापस लाना चाहते हैं। इस मायने में यह फिल्म हमें इतिहास से सबक लेने और वर्तमान की चुनौतियों के लिए कमर कसने को प्रेरित करती है। पता चला कि यह महत्वपूर्ण फिल्म अभी तक नेट पर उपलब्ध नहीं थी। इस शानदार फिल्म को 'बर्बरता के विरुद्ध' ब्लॉग को देने के लिए गौहर रजा का शुक्रिया और इस फिल्म को नेट पर उपलब्ध कराने के लिए संदीप के अनवरत प्रयासों के लिए उनका धन्यवाद।