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Sunday, April 19, 2009

डा.विनायक सेन की ओर से जस्टिस कृष्‍णा अय्यर की प्रधानमंत्री के नाम अपील

(आज हिन्‍दू में जस्टिस वी.आर. कृष्‍णा अय्यर, सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व न्‍यायाधीश की ओर से प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह को दिनांक 17 अप्रैल, 2009 को लिखे गये पत्र का मुख्‍य अंश प्रकाशित हुआ है। डा. सेन को जमानत न मिलना भारतीय न्‍यायपालिका के सबसे अजीबोगरीब फैसलों में शुमार हो चुका है। हाल में वरुण को जमानत दे देने और डा. सेन की जमानत अर्जी खारिज करने पर कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। उधर डा. विनायक की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। सरकारी डॉक्‍टर ने उनका जल्‍द से जल्‍द इलाज कराने की अनुशंसा की है जिस पर फिलहाल कोई कार्रवाई नहीं हुई है। क्‍या डा. सेन को एक धीमी मौत की ओर ले जाया जा रहा है? निश्चित रूप से आने वाले दिनों में न्‍यायालय से इस मामले में सार्थक पहल की उम्‍मीद की जानी चाहिए। जस्टिस कृष्‍णा अय्यर के पत्र का हिन्‍दी अनुवाद करके यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं...)

मैं आपका ध्‍यान एक बेहद अन्‍यायपूर्ण मामले की ओर दिलाना चाहता हूं जोकि भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहद शर्मनाक है : यह मामला है सुविख्‍यात बालरोग विशेषज्ञ और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए लड़ने वाले डा. विनायक सेन का।
इस कुशल डॉक्‍टर को लगभग दो वर्षों से रायपुर जेल में और फिलहाल छत्तीसगढ़ राज्‍य जनसुरक्षा अधिनियम, 2005 के अन्‍तर्गत कारावास में बन्‍दी बनाकर रखा गया है। डा. सेन जोकि ग्रामीण गरीब आबादी के बीच अपने सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य के कामों की बदौलत पूरी दुनिया के पैमाने पर जानेमाने ख्‍यातिप्राप्‍त डॉक्‍टर हैं, के खिलाफ ''राजद्रोह और राज्‍य के विरुद्ध युद्ध छेड़ने'' के आरोप लगाये गये हैं।
छत्तीसगढ़ के लोक अभियोजक ने दावा किया है कि विनायक ने, एक अपुष्‍ट षड्यंत्र के हिस्‍से के तौर पर, एक वरिष्‍ठ माओवादी नेता नारायण सान्‍याल, जोकि रायपुर जेल में हैं, की ओर से कई पत्र एक स्‍थानीय व्‍यवसायी को दिये, जिसके कथित रूप से वामपंथी-दुस्‍साहसवादियों से संबंध थे। ऐसा कहा गया है कि विनायक द्वारा यह काम जेल में सान्‍याल से एक मानवाधिकार कार्यकर्ता और कई बीमारियों के लिए उनका इलाज कर रहे एक डॉक्‍टर, दोनों के तौर पर मिलने के दौरान किया गया।
हालांकि डा. सेन के मुकदमे, जोकि रायपुर सेशन कोर्ट में अप्रैल 2008 के अंत में शुरू हुआ था, में उनके खिलाफ लगाये गये इन आरोपों को सही साबित करने वाले साक्ष्‍यों का छोटे से छोटा हिस्‍सा भी प्रस्‍तुत नहीं किया जा सका है। मूल आरोपपत्र के हिस्‍से के तौर पर गवाही देने के लिए 83 गवाहों की सूची मार्च 2009 में अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्‍तुत की गयी थी, जिसमें से 16 का नाम स्‍वयं सरकार ने वापस ले‍ लिया, और छह लोगों को 'प्रतिकूल' घोषित कर दिया गया, जबकि 61 लोगों से डा. सेन के खिलाफ किसी भी आरोप की पुष्टि करवाये बगैर गवाही दिलवा दी गयी। डा. सेन के खिलाफ मामले के गुण-दोषों की चर्चा न भी की जाये, तो भी अभी तक चलाये गये मुकदमे की कार्रवाई के तरीके के कई पहलू बेहद विक्षोभजनक हैं।
इतना सब पर्याप्‍त न मानते हुए, डा. सेन की जमानत पर रिहाई की अपील विलासपुर उच्‍च न्‍यायालय द्वारा बार-बार (सितंबर 2007 में और दिसंबर 2008 में) अस्‍वीकार कर दी गयी। और उच्‍चतम न्‍यायालय ने उनकी रिहाई की प्रार्थना के लिए स्‍पेशल लीव पेटिशन पर सुनवाई करते हुए उसे ठुकरा दिया।
अभी तक डा. सेन के मुकदमे में साक्ष्‍यों की कमी को ध्‍यान में रखते हुए रायपुर न्‍यायालय को पूर्ण निष्‍पक्षता के साथ तत्‍काल उनके खिलाफ पूरे मुकदमे को रद्द कर देना चाहिए। निश्चित रूप से अभियोजन पक्ष की स्थिति की कमजोरी उन्‍हें कम से कम जमानत पर रिहा होने का हकदार बना देती है। डा. सेन अपने पूरे शानदार कैरियर के दौरान त्रुटिहीन व्‍यवहार के रिकार्ड के साथ, अन्‍तरराष्‍ट्रीय स्‍तर के और सम्‍मानित व्‍यक्ति हैं। मई 2008 में एक अभूतपूर्व कार्रवाई के तहत 22 नोबेल पुरस्‍कार विजेताओं ने उन्‍हें 'पेशेवर सहकर्मी' बताते हुए और उनकी रिहाई की मांग करते हुए एक सार्वजनिक वक्‍तव्‍य पर हस्‍ताक्षर भी किये थे।
सामान्‍य तौर पर जमानत देना उन्‍हीं मामलों में अस्‍वीकार किया जाता है जहां न्‍यायालय को लगता है कि आरोपी साक्ष्‍यों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है, गवाहों को पूर्वाग्रहित कर सकता है या भाग सकता है। डा. सेन के मामले में इनमें से कोई भी वजह लागू नहीं होती है, जैसा कि इस सामान्‍य तथ्‍य से पता चलता है कि उनकी गिरफ्तारी के समय उन्‍होंने अपनी संभावित कैद के बारे में जानते हुए भी छत्तीसगढ़ पुलिस के पास स्‍वेच्‍छा से आने का रास्‍ता चुना और भागने की कोई कोशिश नहीं की।
आज डा. सेन जो मधुमेह के रोगी हैं और अति रक्‍त दाब (हाइपरटेंसिव) के रोगी भी हैं, को अपने हृदय की बिगड़ती जा रही स्थिति के चिकित्‍सकीय इलाज की अत्‍यावश्‍यक आवश्‍यकता है। हाल के सप्‍ताहों में उनका स्‍वास्‍थ्‍य बहुत गिर गया है और उनकी जांच के लिए न्‍यायालय द्वारा नियुक्‍त डॉक्‍टर ने अनुशंसा की है कि उन्‍हें कोई भी देरी किये बिना एंजियोग्राफी, और यदि आवश्‍यक लगे तो संभवत: एंजियोप्‍लास्‍टी करवाने के लिए वैल्‍लोर स्‍थानांतरित कर दिया जाना चाहिए।
उनके सामाजिक योगदान को मान्‍यता देने की बजाय भारतीय राज्‍य ने, डा. सेन और उनकी तरह मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाले कई लोगों पर गलत ढंग से 'आतंकवादी' होने का ठप्‍पा लगाकर न केवल लोकतांत्रिक नियमों और निष्‍पक्ष शासन को बल्कि अपनी संपूर्ण आतंकवाद विरोधी रणनीति और कार्य को भी पूर्ण रूप से विद्रुपता का विषय बना दिया है।
जमानत का बार-बार अस्‍वीकार किया जाना, जिसका नतीजा 'मुकदमे द्वारा दंड' होता है, भारतीय समाज के लिए एक ज्‍यादा बड़ा खतरा है। इस मामले में हो रहा सरासर अन्‍याय साधारण नागरिकों में भारतीय लोकतंत्र की साख और प्रभाविता के बारे में खुद-ब-खुद केवल उदासीनता पैदा करने के अलावा और कुछ नहीं करेगा।