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Saturday, January 10, 2009

गाज़ा में मरने वालों की संख्‍या 800 हुई

गाज़ा में अब तक मरने वाले लोगों की संख्‍या 800 को पार कर गयी है। एक और नृशंस हत्‍याकाण्‍ड को अंजाम देते हुए कल इजरायली फौज ने 30 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। पहले खुद इजरायली फौज ने ही लगभग 120 लोगों को एक मकान में इकट्ठा किया और फिर गोलाबारी से उस मकान को उड़ा दिया। मरने वालों में कई बच्‍चे और औरतें शामिल हैं। वहां से बचकर निकले एक बच्‍चे ने बताया कि उस मकान में अभी भी लाशों के बीच कई घायल लोग पड़े चिल्‍ला रहे हैं। वहां न पानी है, न बिजली। उन लोगों कों जर्बदस्‍ती कई घरों से निकाल कर उस मकान में इकट्ठा किया गया था। मरने वालों में सबसे छोटा पांच महीने का बच्‍चा भी है। संयुक्‍त राष्‍ट्र मानवीय सहायता कार्यालय ने इसे अब तक का सबसे वीभत्‍स हमला कहा है।

Wednesday, December 31, 2008

हमास को हटाना कौन सा लोकतंत्र है?

बच्‍चों, बूढ़ों, आम नागरिकों पर हमला करके इजरायल हमास को खत्‍म करने का मंसूबा बांधे हुए है। एक बात तो यही है कि अगर हमास को खत्‍म करना है तो नागरिकों पर हमले ही क्‍यों हो रहे है दूसरी और ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण बात कि हमास को खत्‍म करने का अधिकार इजरायल सरकार को किसने दिया है? हमास पहले फिलीस्‍तीनी लोगों के वोट पाकर शासन में आया था न कि बंदूक के जोर पर। उसे भंग क्‍यों किया गया? लोगों के चुने हुए प्रतिनिधियों को हटाना लोकतंत्र की किस परिभाषा के अंतर्गत आता है? इसी तर्क से चला जाए तो नेपाल की माओवादी सरकार को भी उखाड़ फेंकना चाहिए अगर वह नेपाली जनता को बचाने के लिए किसी हमले का जवाब दे। दरअसल लोकतंत्र, जिसकी इतनी दुहाई दी जाती है उसको अमेरिका और इजरायल और उनके लग्‍गू-भग्‍गू जब जैसा चाहते हैं वैसा इस्‍तेमाल कर लेते हैं। कुल मिलाकर लोकतंत्र उनके लिए टिश्‍यू पेपर से ज्‍यादा नहीं है जिसे इस्‍तेमाल करने के बाद वो इसे कभी भी कूड़े की टोकरी में फेंक देते हैं। इस ''लोकतंत्र'' में विश्‍वास क्‍या हिलता दिखाई नहीं दे रहा है?
(पुनश्‍च: ताजा खबर है कि इजरायल ने गाजापट्टी की घेरेबंदी में समुद्र के रास्‍ते दवाईयां लाने वाले जहाज 'डिगनिटी' पर हमला करके उसे वापस जाने पर मजबूर कर दिया है। फिलीस्‍तीन के अस्‍पतालों में दवाइयों की भारी किल्‍लत है। और ओबामा जिन्‍हें काफी बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया था, ने इस मामले में चुप्‍पी साध ली है। हमारे देश में माकपा नाम की पार्टी ने इन हमलों का विरोध किया जिसके खुद के हाथ सत्‍तर के दशक में हजारों निर्दोष छात्रों-किसानों और हाल में नंदीग्राम और लालगंज के लोगों के खून से सने हैं।)

Sunday, December 28, 2008

क्‍या इजरायली सरकार आतंकवादी नहीं है?

गाजा में बेकसूरों का खून बहाने वाली इजरायली सरकार क्‍या आतंकवादी नहीं है? हम आतंकवाद को एक ही चश्‍मे से क्‍यों देखते हैं? क्‍या इसलिए कि हमें ऐसे ही देखना सिखाया जाता है। हालांकि बहुत सारे लोग इस बात से सहमत नहीं होंगे लेकिन हम आतंकवाद को दरअसल उस नजरिए से देखते हैं जो देश और दुनिया भर की सरकारें हमें दिखाती हैं। जबकि हकीकत यह है कि राज्‍य या सरकारी आतंकवाद ज्‍यादा घातक और अमानवीय होता है। आंकड़े भी बताते हैं कि राज्‍य आतंकवाद से मरने वाले निर्दोष लोग संख्‍या में कहीं ज्‍यादा होते हैं। लेकिन इसके खिलाफ कोई असंतोष नहीं दिखाई देता है। वजह वही नजरिया है जो सरकारों ने हमें दिया है। इस घटना को ही लें। क्‍या आपको लगता है कि इसकी दुनिया के पैमाने पर इतनी भर्त्‍सना होगी जितनी मुम्‍बई हमलों या किसी और हमले की हुई थी। यकीनन नहीं। क्‍योंकि यह बात ही जेहन से गायब कर दी गई है कि राज्‍य या सरकार भी आतंकवादी कार्रवाई कर सकती है। आतंकवाद की परिभाषा को सरकारें बड़ी चालाकी से अपने आतंकवाद को छुपाने और कमजोरों के प्रतिरोध पर नकारात्‍मक लेबल चस्‍पां करने के लिए इस्‍तेमाल करती हैं। असल में आतंकवाद आतंकवाद होता है। बल्कि कई बार कमजोरों की बदले की कार्रवाई राज्‍य या सरकारों के दमन के जवाब में ही होती हैं। गाजा का नरंसहार एक आतंकवादी घटना है। और इसके लिए इजरायली सरकार को भी आतंकवादी माना जाना चाहिए। सवाल यह है कि आतंकवाद की परिभाषा को हम सरकारों से उधार लेकर मानते रहेंगे या खुद आतंकवाद (अन्‍य और राज्‍य के आतंकवाद को भी) को ठीक से समझना शुरू करेंगे।