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Tuesday, February 10, 2009

क्‍या नेपाली क्रान्ति के संदेश को हम समझ रहे हैं?

नेपाल में जनयुद्ध शुरू होने की 12वीं वर्षगांठ परसों यानी 12 फरवरी को है। 12 फरवरी 1996 से नेपाली जनता ने अत्‍याचारी राजा और भ्रष्‍ट लोकशाही के खिलाफ संघर्ष छेड़ा था। आज यह संघर्ष एक कठिन मंजिल पर है और इसकी अंतिम मंजिल तो बेशक अभी काफी दूर है। लेकिन नेपाल की आम गरीब जनता ने पूरी दुनिया में लागू व्‍यवस्‍था को नकार कर, उसके तथाकथित लोकतंत्र को अस्‍वीकार करके सारी दुनिया के लिए क्‍या कोई संदेश नहीं दिया है? क्‍या पूरी दुनिया में जनसंघर्षों के लिए इस क्रान्ति से सीखने के लिए कुछ है?
राजा के समय में नेपाल में देश की 90 फीसदी जनता भयंकर भुखमरी, बेरोजगारी का शिकार थी। इस कठिन जीवन में कोढ़ में खाज राजा के सामंत, जागीरदार, लठैत, पुलिस पैदा करते थे। साथ ही पैसे वालों की छोटी सी जमात पैदा हो गई जो मुनाफे के बाजार को जनता का खून-पसीना निचोड़कर फैलाना चाहती थी। लोकतंत्र आया लेकिन उसके आने के बाद फर्क सिर्फ इतना पड़ा कि एक की जगह कई राजा हो गए। लोगों का जीवन उतना ही कष्‍टकारी और दुखभरा था। लोग वास्‍तविक बदलाव चाहते थे। इसी समय क्रान्तिकारियों के आह्वान पर जनयुद्ध की घोषणा हुई जिसके लगभग 10 सालों तक चलने के बाद आज का मुकाम हासिल हुआ। नेपाल के लोगों को समझ आया कि राजशाही हो या लोकतंत्र, जनता का जीवन तो चंद लोगों की मुट्ठी में ही रहता है। इसलिए इस धोखे को खत्‍म करके अपने राज-काज के लिए लड़ा जाए। पूरी दुनिया में अभी भी बहुत से लोग हैं जो ये समझते हैं कि वर्तमान व्‍यवस्‍था के भीतर ही सुधार कर इसे अच्‍छा बनाया जा सकता है। हालांकि ऐसे लोग न तो इतिहास की ठीक समझ रखते हैं न समाज की। नेपाली गरीब, अनपढ़ जनता ने इस व्‍यवस्‍था को नकार कर संकेत दिया है कि चाहे जनता के राज-काज के प्रयोग कितनी बार असफल हो गये हों लेकिन अंतत: उनके जीवन में सुधार आ सकता है तो इसी के जरिए। यानी जब तक सामाजिक व्‍यवस्‍था में सुधार नहीं आमूलचूल परिवर्तन न किये जायेंगे। सुधार-सुधार के खेल से कुछ हासिल नहीं हो सकता। क्‍‍या इस संकेत को हम लोग समझ रहे हैं?

Wednesday, December 31, 2008

हमास को हटाना कौन सा लोकतंत्र है?

बच्‍चों, बूढ़ों, आम नागरिकों पर हमला करके इजरायल हमास को खत्‍म करने का मंसूबा बांधे हुए है। एक बात तो यही है कि अगर हमास को खत्‍म करना है तो नागरिकों पर हमले ही क्‍यों हो रहे है दूसरी और ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण बात कि हमास को खत्‍म करने का अधिकार इजरायल सरकार को किसने दिया है? हमास पहले फिलीस्‍तीनी लोगों के वोट पाकर शासन में आया था न कि बंदूक के जोर पर। उसे भंग क्‍यों किया गया? लोगों के चुने हुए प्रतिनिधियों को हटाना लोकतंत्र की किस परिभाषा के अंतर्गत आता है? इसी तर्क से चला जाए तो नेपाल की माओवादी सरकार को भी उखाड़ फेंकना चाहिए अगर वह नेपाली जनता को बचाने के लिए किसी हमले का जवाब दे। दरअसल लोकतंत्र, जिसकी इतनी दुहाई दी जाती है उसको अमेरिका और इजरायल और उनके लग्‍गू-भग्‍गू जब जैसा चाहते हैं वैसा इस्‍तेमाल कर लेते हैं। कुल मिलाकर लोकतंत्र उनके लिए टिश्‍यू पेपर से ज्‍यादा नहीं है जिसे इस्‍तेमाल करने के बाद वो इसे कभी भी कूड़े की टोकरी में फेंक देते हैं। इस ''लोकतंत्र'' में विश्‍वास क्‍या हिलता दिखाई नहीं दे रहा है?
(पुनश्‍च: ताजा खबर है कि इजरायल ने गाजापट्टी की घेरेबंदी में समुद्र के रास्‍ते दवाईयां लाने वाले जहाज 'डिगनिटी' पर हमला करके उसे वापस जाने पर मजबूर कर दिया है। फिलीस्‍तीन के अस्‍पतालों में दवाइयों की भारी किल्‍लत है। और ओबामा जिन्‍हें काफी बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया था, ने इस मामले में चुप्‍पी साध ली है। हमारे देश में माकपा नाम की पार्टी ने इन हमलों का विरोध किया जिसके खुद के हाथ सत्‍तर के दशक में हजारों निर्दोष छात्रों-किसानों और हाल में नंदीग्राम और लालगंज के लोगों के खून से सने हैं।)

Tuesday, December 23, 2008

मुन्‍तज़र और इराकी-अमेरिकी लोकतंत्र का खेल

मुन्‍तज़र अल जैदी के मामले में साफ होता जा रहा है कि इराकी सरकार उसी ''लोकतंत्र'' के नियम-कानूनों का मखौल उड़ा रही है जिसकी वह इतनी दुहाई दिया करती है। खबर है कि हिरासत में उसके साथ बेहद अमानवीय व्‍यवहार किया जा रहा है और घोर यातनाएं दी जा रही हैं। जेल में उससे मिलकर लौटे उसके भाई उदय ने बताया कि उसका एक दांत टूट गया है, आंख पर गहरी चोट का निशान है, शरीर पर सिगरेट से दागे जाने और पिटाई के निशान है। हिरासत में मुन्‍तज़र को नंगा करके उल्‍टा लटकाया गया, दागा गया और मोटे तार से पिटाई की गई। मुन्‍तज़र का कहना है कि उससे जबर्दस्‍ती माफीनामे पर हस्‍ताक्षर करवाए गए थे। और अब उसका संबंध जबर्दस्‍ती किसी धार्मिक कट्टरपंथी नेता के साथ जोड़ा जा रहा है ताकि उसे ढंग से फंसाया जा सके।
यह दिखने लगा है कि इराकी सरकार उसे छोड़ने नहीं जा रही है। अगर मुन्‍तज़र को अपने इस काम (जिसे बुश ने मुक्‍त समाजों की देन बताया था) के लिए कानूनी या गैरकानूनी मौत दे दी जाए तो आश्‍चर्य नहीं करना चाहिए। यह ''लोकतंत्र'' ऐसा ही है। इसकी अदालतें, कानून, इंसाफ सबकी असलियत सामने आती जा रही है। सवाल यह है कि इस नंगी सच्‍चाई को हम लोग स्‍वीकारना कब शुरू करेंगे।
मुन्‍तज़र ने कहा है कि अगर मौका मिला तो वो दोबारा ऐसा ही करेगा। शायद मुन्‍तज़र जैसे अनगिनत लोगों का जज़्बा और कुर्बानियां इस सच्‍चाई को हमें समझाने में थोड़ी कामयाब हो पाये।