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Tuesday, January 13, 2009

हिंसा को ताकत समझने की गलतफहमी पालने वाला समाज सामूहिक मानसिक पागलपन का रोगी है।

इज़रायल के हमले को ज़ायज ठहराने वाले हमारे यहां भी कम नहीं हैं। इस मानसिकता को मार्क लेविन ने अलजजीरा चैनल पर अपने लेख में सामूहिक पागलपन बताया है। यह लेख इन हमलों के खिलाफ इज़रायल के अन्‍दर से उठने वाली आवाज़ों को दर्ज करता है। वैसे इसी मानसिकता पर आज जनसत्ता में अपूर्वानंद ने भी सवाल उठाया है। भारत द्वारा इज़रायल जैसे हमले पाकिस्तान पर किये जाने का सवाल किसी पत्रकार द्वारा करना अपने आपमें इस खतरे की ओर इशारा कर देता है। इन लेखों को पढ़कर इज़रायल की बीमारी और उसके कीटाणु यहां गंभीरता से मौजूद होने का पता चलता है और उनसे सचेत रहने की जरूरत महसूस हो सकती है।

Thursday, January 8, 2009

इजरायल ने अपनी नाकामयाबी पुख्‍ता कर ली है

इजरायल जिस मकसद से अपना टनों गोला-बारूद खर्च कर रहा है, उसमें वह कभी कामयाब नहीं हो पायेगा। मौत के इन सामानों से वह कुछ बच्‍चों, औरतों, बूढ़ों और लोगों की जिन्‍दगियां तो छीन सकता है लेकिन वह जिस चीज को आतंकवाद बता कर खत्‍म कर देना चाहता है, उसका कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा। बल्कि हरेक मौत उस चीज को ज्‍यादा मजबूत और गहरा बना रही है।
वह चीज है प्रतिरोध। इजरायल हमास को खत्‍म करने की बात कर रहा है लेकिन वह भी जानता है कि दरअसल उसे खत्‍म करना है‍ फिलीस्‍तीनी लोगों का हौसला, उनके लड़ने की ताकत और उनका प्रतिरोध। लेकिन वह भूल रहा है कि जब किसी चीज को दबाया जाता है तो वह उतनी ही तेजी से वापस आती है। इजरायल कुछ लोगों को खत्‍म कर सकता है लेकिन क्‍या वह उस गुस्‍से को खत्‍म कर पायेगा जो अपने बच्‍चों की लाश देखकर एक बाप के सीने में पैदा हुआ है, क्‍या वह उस आक्रोश को गोली मार सकता है जो अपने जवान भाई की लाश देखकर किसी नौजवान के दिलोदिमाग में पैदा हो रहा है। बेबसी से उपजे इस गुस्‍से को इजरायल या उसके आका अमेरिका की कोई भी गोली, कोई भी रॉकेट, कोई भी मिसाईल खत्‍म नहीं कर पाएगा। इस प्रतिरोध की जमीन चाहे आज कमजोर हो लेकिन दुनिया के पैमाने पर इजरायल और उसके आका के लूट के साम्राज्‍य के खिलाफ धर्म के अलावा एक नयी जमीन से विरोध का स्‍वर उठेगा और उन्‍हें नेस्‍तनाबूद कर डालेगा।

Sunday, December 28, 2008

क्‍या इजरायली सरकार आतंकवादी नहीं है?

गाजा में बेकसूरों का खून बहाने वाली इजरायली सरकार क्‍या आतंकवादी नहीं है? हम आतंकवाद को एक ही चश्‍मे से क्‍यों देखते हैं? क्‍या इसलिए कि हमें ऐसे ही देखना सिखाया जाता है। हालांकि बहुत सारे लोग इस बात से सहमत नहीं होंगे लेकिन हम आतंकवाद को दरअसल उस नजरिए से देखते हैं जो देश और दुनिया भर की सरकारें हमें दिखाती हैं। जबकि हकीकत यह है कि राज्‍य या सरकारी आतंकवाद ज्‍यादा घातक और अमानवीय होता है। आंकड़े भी बताते हैं कि राज्‍य आतंकवाद से मरने वाले निर्दोष लोग संख्‍या में कहीं ज्‍यादा होते हैं। लेकिन इसके खिलाफ कोई असंतोष नहीं दिखाई देता है। वजह वही नजरिया है जो सरकारों ने हमें दिया है। इस घटना को ही लें। क्‍या आपको लगता है कि इसकी दुनिया के पैमाने पर इतनी भर्त्‍सना होगी जितनी मुम्‍बई हमलों या किसी और हमले की हुई थी। यकीनन नहीं। क्‍योंकि यह बात ही जेहन से गायब कर दी गई है कि राज्‍य या सरकार भी आतंकवादी कार्रवाई कर सकती है। आतंकवाद की परिभाषा को सरकारें बड़ी चालाकी से अपने आतंकवाद को छुपाने और कमजोरों के प्रतिरोध पर नकारात्‍मक लेबल चस्‍पां करने के लिए इस्‍तेमाल करती हैं। असल में आतंकवाद आतंकवाद होता है। बल्कि कई बार कमजोरों की बदले की कार्रवाई राज्‍य या सरकारों के दमन के जवाब में ही होती हैं। गाजा का नरंसहार एक आतंकवादी घटना है। और इसके लिए इजरायली सरकार को भी आतंकवादी माना जाना चाहिए। सवाल यह है कि आतंकवाद की परिभाषा को हम सरकारों से उधार लेकर मानते रहेंगे या खुद आतंकवाद (अन्‍य और राज्‍य के आतंकवाद को भी) को ठीक से समझना शुरू करेंगे।