Friday, May 1, 2009

सुने बहुत है किस्‍से तुमने राजाओं के, हूरों के,/पर जाना मत भूल खून के छींटे उन मजदूरों के

(आज एक मई है। यह सच है कि ये दौर अंधेरे का दौर है। आज बुराई की ताकतें हावीं हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि न हमारी हार अंतिम है न उनकी जीत अंतिम। अंतिम जीत इंसानियत की होना तय है। इसलिए आज उसके सपनों को भी जिंदा रखना है। पेश है एक अनजान कवि नरेन्‍द्र का यह जोशोखरोश से भरा यह गीत।)
यकुम मई
—नरेन्‍द्र (यकुम मई यानी 1 मई)
दूर देश की बात, सुनाऊं दूर देश की बात, सुनो, साथियो...!

दूर देश अमरीका,/जिसमें शहर शिकागो है विख्‍यात,/सन अट्ठारह सौ छ्यासी में/यकुम मई की है यह बात/
सभी और दौलत की दमक थी,/सभी ओर रोशन रौनक,/आंखें चकाचौंध हो जाती थी/ऐसी सब ओर चमक।
पर यह किसकी चमक-दमक थी,/थे यह किसके बाग-बजार?

क्‍या उनके, जो मेहनत पर।/मजदूरी पर रखते घर-बार?
या उनके, जो मजदूरों की/मेहनत पर ही जीते हैं?
मजदूरों का लाल लहू/जो दारू कहकर पीते हैं?
देश-देश में मुफ्तखोर हैं,/देश-देश में मेहनतकश मुफ्तचोर चालाक चोर,//पर वही कमाते सम्‍पत-जस!
मन्दिर उनके, मस्जिद उनकी/गिरजे उनकी बाजू में पैगम्‍बर,/औतार, मसीहा, जैसे बाट तराजू में/
दीन भी उनका, दुनिया उनकी,/उनकी तोप और तलवार,/उनके अफसर और गर्वनर,/उनके ही साहब सरकार!
है ऐसे यह दौलतवाले/जिनसे जूझे थे मजदूर,/खून से लथपथ, भूख से टूटे, थके हुए औ चकनाचूर!
यकुम मई का प्‍यारा दिन था/दिन बहार के आये थे,/ऐसे वक्‍त में मौत के मारे/ये मजूर क्‍यों आये थे?

आये ये मजदूर, गोलियां खाने क्‍यों, किससे खिंच कर?
ये भूखे जीते-मरते हैं/किन आदर्श-असूलों पर?

लिये लाल झण्‍डा लहराता,/फहराता सबके सिर पर,/आई मजदूरों की टोली, टोली पर टोली घिर कर/
सड़कों पर छा गये मजूरे/जोशीले, सीना खोले!/और सामने पुलिस फौज औ संगीनें, गोली गोले!
हाथ-पांव मेहनत के लिए,
तो पेट न क्‍या भरने के लिए?
क्‍या अमीर जीने के लिए हैं?
गरीब मरने के लिए?


घंटे आठ मजूरी के हों/इतनी बात करो पक्‍की,/मोल खरीदे नहीं कि पीसे/आठ पहर मिल की चक्‍की
थीं इतनी-सी बात,/मजूरों जिस पर गोली खानी थी!/मजदूरों को आज बात पर/दिखलानी मर्दानी थी!
जो सहेंगे नहीं मेहनती,
जुल्‍म को जुल्‍म बतायेंगे!
दुनिया में इंसाफ नहीं
हम दुनिया नई बसायेंगे!

दुनिया के मजदूर एक हो,/एके से ही बरकत है,/जब मौका हो कमर कसो,/तुम समझो—कारबकसरत है
जो दुनिया में पैदा करता,/वह दुनिया का मालिक है,/वह नसीब का भी स्‍वामी है,/वही खल्‍क का खालिक है!
जोरो जुल्‍म जिसको सहना हो,/वह चुपचाप सहे जावे,/जिसको दुनिया नई बनानी हो,/निधड़क आगे आवे!
वह दुश्‍मन से डरता है कब,/साथिन है हंसिया जाकी?
जिसके हाथ हथौड़ा, उसको
खौफ न मरने का बाकी!
बढ़ा काफला मजदूरों का/कुत्ते लगे भूंकने झट/सरमायादारी ने डर कर,/घबरा कर बदली करवट!
फिर आवाज बुलन्‍द हुई
वह इंकलाब, फिर, जिन्‍दाबाद।
हो बरबाद सरमायादारी,
इंकलाब, जिन्‍दाबाद!

तुरंत किटकिटाई मशीनगन,/धायं-धायं गोली चलती,/भोंकी सीने में संगीनें,/पांवों में धरती हिलती!
शहर शिकागो है विख्‍यात,/सन अट्ठारह सौ छ्यासी में/यकुम मई की है यह बात/
सुने बहुत है किस्‍से तुमने राजाओं के, हूरों के,/पर जाना मत भूल खून के
छींटे उन मजदूरों के
मई महीने का पहला दिन है/मजदूरों का त्‍यौहार,/आज कौल दोहराओ सब मिल/कभी न मानेंगे हम हार!
अड़े रहेंगे, बढ़े चलेंगे, /दुश्‍मन से बाजी लेंगे, /हाथ हथौड़ा लिए, जुल्‍म से, खाली दुनिया कर देंगे!
फिर आवाज बुलन्‍द करो सब—
इन्‍कलाब, फिर, जिन्‍दाबाद!
हो बरबाद, सरमायादारी,
इन्‍कलाब जिन्‍दाबाद!