Saturday, April 25, 2009

अब एमनेस्‍टी इंटरनेशनल ने भी की विनायक सेन की रिहाई की मांग

विनायक सेन की गिरफ्तारी पर अब प्रतिष्ठित अंतर्राष्‍ट्रीय एजेंसिंया भी सवाल उठाने लगी हैं। एमनेस्‍टी इंटरनेशनल ने भी विनायक सेन की रिहाई का समर्थन किया है। एमनेस्‍टी इंटरनेशनल के ताजा वक्‍तव्‍य में कहा गया है कि विनायक सेन पर लगाए गए आरोप ''आधारहीन हैं और राजनीति से प्रेरित हैं'' साथ ही उन्‍हें कैद में रखना अंतर्राष्‍ट्रीय कानून का उल्‍लंघन है। वक्‍तव्‍य में आगे कहा गया है कि ''यह एक जीता-जागता उदाहरण है कि किस तरह भारतीय शासन तंत्र एक्टिविस्‍टों को निशाना बनाने के लिए सुरक्षा से जुड़े कानूनों का दुरुपयोग कर रहा है। ये कानून सवालों के घेरे में हैं क्‍योंकि इनकी ''गैरकानूनी गतिविधियों'' की अस्‍पष्‍ट और अतिरंजित परिभाषाएं गढ़ी गई हैं। किसी भी परिस्थिति में ऐसे कामों को 'गैरकानूनी गतिविधि' नहीं माना जाना चाहिए जो शांतिपूर्ण ढंग से मानवाधिकारों की रक्षा करते हैं।'' एमनेस्‍टी इंटरनेशनल ने इस मसले पर अपना रोष प्रकट करते हुए कहा, ''उनके ऊपर लगाए गए आरोप जिन कानूनों के आधार पर लगाए गए हैं, वे अंतर्राष्‍ट्रीय मानकों का उल्‍लंघन करते हैं। उनके मुकदमे में बार-बार देर होने से इसकी निष्‍पक्षता पर भी संदेह पैदा हो गया है।''
एमनेस्‍टी इंटरनेशनल का वक्‍तव्‍य उस पूरी प्रक्रिया के लिए एक आईना है जो सबूतों, कानून और इंसाफ पर टिके होने का दावा करती है। यह बात गौर करने वाली है कि विनायक सेन पर तमाम कोशिशों के बावजूद माओवादियों से संबंध होने का कोई पुख्‍ता सबूत छत्तीसगढ़ सरकार पेश नहीं कर पाई है। हर सुनवाई पर छत्तीसगढ़ सरकार का पक्ष लगातार कमजोर होता जा रहा है। वैसे भी विनायक सेन का मुद्दा अब एक अंतर्राष्‍ट्रीय मुद्दा बनता जा रहा है। दुनिया भर में नागरिक, जनवादी और मानवाधिकारों के लिए काम कर रही संस्‍थाएं और लोग इस मसले पर अपनी चिंताएं प्रकट कर रहे हैं।
विनायक सेन की पत्‍नी इलीना सेन ने फिर से यह बात दोहराई है कि विनायक सेन को तत्‍काल इलाज की जरूरत है और छत्तीसगढ़ में उनकी जान को खतरा होने की पूरी संभावना है।
विनायक सेन हमारे समय की एक कसौटी बनते जा रहे हैं जिससे समाज के एक दिशा में जाने के संकेत साफ मिल रहे हैं....

8 comments:

रौशन said...

इतने दिनों से विनायक सेन का सलाखों के पीछे होना ये बताता है कि सरकार किस तरह से निरंकुश हो चुकी है.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

ek taraf vinayak sen ki giraftari aur dusari tarf varun ko jamanat.

yah vyavstha ka asli chehra hai.

Mahesh Sinha said...

एमनेस्टी कब से अदालत हो गयी और फैसले सुनाने लग गयी , अमेरिका में तो पहले सब ठीक करवा लें फिर बाहर नजर घुमाएं. एमनेस्टी अपने सम्बन्ध भी जाहिर करे बिनायक सेन से . सुदूर हिंदुस्तान में एक व्यक्ति की उन्हें चिंता है , उन आदिवासिओं की नहीं जो आतंवादिओं द्वारा मरे जा रहे हैं . एमनेस्टी केवल सरकारों का विरोध करती है . आतंकवाद का क्यों नहीं ?

Sanjeet Tripathi said...
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Mahesh Sinha said...

?

Mahesh Sinha said...

एमनेस्टी ने इस मामले में मेरे प्रश्न का कोई जवाब देना उचित नहीं समझा ?

Sanjeet Tripathi said...

क्यों प्रभु, आप इतने अलोकतांत्रिक हैं कि पाठक के कमेंट को ही डिलिट कर देते हैं?

मैने कमेंट किया था डिलिट कर दिया आपने।
मैने जो लिखा था फिर लिख रहा हूं।

'कभी छत्तीसगढ़ आना हुआ है आपका? पहले छत्तीसगढ़ में आकर रहिए फिर यहां के मुद्दों को जानने-समझने के बाद उस पर कुछ लिखिए'

Kapil said...

संजीतजी, आपके पास कहने के लिए बात ही नहीं है तो मैं क्‍या कर सकता हूं। आपकी जिस टिप्‍पणी को मैने हटाया है वह टिप्‍पणी नहीं आपकी पूरी पोस्‍ट थी जिसे आपने उठाकर कॉपी-पेस्‍ट कर दिया था। ऐसे कॉपी-पेस्‍ट से कब तक काम चलाएंगे। अगर आपको मेरी इस पोस्‍ट पर कुछ कहना है तो आपका स्‍वागत है। आप खुलकर अपनी बात कहिए। उम्‍मीद है आइंदा टिप्‍पणी करने की मेहनत से बचेंगे नहीं।
आपकी सलाह गौर करने वाली है। पर एक दिक्‍कत आ गई है। समझ ये आ रहा है कि भाई मीडिया चाहे दिल्‍ली का हो, बंगाल का, पंजाब का या छत्तीसगढ़ का। उसके मालिकान और उनकी पक्षधरता, कारपोरेट जगत, सरकार और पार्टियों से उनके संबंध सब जगह एक जैसे है। अब बताइये इसका कोई समाधान है आपके पास।