Tuesday, January 13, 2009

हिंसा को ताकत समझने की गलतफहमी पालने वाला समाज सामूहिक मानसिक पागलपन का रोगी है।

इज़रायल के हमले को ज़ायज ठहराने वाले हमारे यहां भी कम नहीं हैं। इस मानसिकता को मार्क लेविन ने अलजजीरा चैनल पर अपने लेख में सामूहिक पागलपन बताया है। यह लेख इन हमलों के खिलाफ इज़रायल के अन्‍दर से उठने वाली आवाज़ों को दर्ज करता है। वैसे इसी मानसिकता पर आज जनसत्ता में अपूर्वानंद ने भी सवाल उठाया है। भारत द्वारा इज़रायल जैसे हमले पाकिस्तान पर किये जाने का सवाल किसी पत्रकार द्वारा करना अपने आपमें इस खतरे की ओर इशारा कर देता है। इन लेखों को पढ़कर इज़रायल की बीमारी और उसके कीटाणु यहां गंभीरता से मौजूद होने का पता चलता है और उनसे सचेत रहने की जरूरत महसूस हो सकती है।

6 comments:

Suresh Chnadra Gupta said...

हिंसा पागलपन का विकसित रूप है. हिंसा ही हिंसा को जन्म देती है. हमास इस्राइल पर आक्रमण करता है. इस्राइल उसका जवाब आक्रमण करके देता है. लोग इस्राइल को हिंसक कहते हैं, हमास को नहीं. यह सोच भी एक प्रकार की हिंसा है. हिंसा का अपने स्वार्थ के लिए सही या ग़लत कहना हिंसा को बढ़ावा दे रहा है. जब तक समाज हिंसा को पूर्ण रूप से नहीं अस्वीकृत करेगा तब तक हिंसा का शिकार होता रहेगा.

अनुनाद सिंह said...

लेख का शीर्षक बहुत सार्थक है किन्तु इजरायल के बजाय मुसलमानो पर ज्यादा फ़िट बैठता है।

संजय बेंगाणी said...

शीर्षक सही है, देखिये भारत ने हमला किया? नहीं ना. यह मानसिकता भारत पर हमला करने वाली कौम की है. भगवान उन्हे सदबुद्धी दे.

डॉ .अनुराग said...

बैगानी जी से सौ प्रतिशत सहमत ......

कपिल said...

संजय और अनुराग भाई, इसका मतलब है कि आप भारत के हमला करने की स्थिति में अपने जैसे तमाम हमला समर्थकों को सामूहिक रूप से पागल घोषित करेंगे? माफ कीजिएगा लेकिन आपकी बातों से यही जाहिर हो रहा है।

रौशन said...

हम किसी हमले का समर्थन या विरोध नही कर रहे हैं पर यहाँ हिन्दुस्तान में बैठ कर बिना सोचे विचारे इजरायल का समर्थन करने वाले मानसिक दिवालिएपन के शिकार लगते हैं.
बहुत सख्त कदमों का प्रयोग करता तो रहा है इजरायल पर क्या वहाँ शान्ति हो गई?
हमें हिन्दुस्तान को इजरायल जैसा तो नही ही बनाना है