Wednesday, March 18, 2009

सपने कभी मर नहीं सकते

'सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना' लिखने वाले क्रान्तिकारी कवि पाश और भगतसिंह का शहादत दिवस 23 मार्च फिर से दस्‍तक दे रहा है। पिछले दिनों कस्‍बा पर रवीशजी ने इन्‍हीं सपनों के मर जाने पर क्षोभ और गुस्‍सा प्रकट किया था। सच है कि बहुत सारे सपने खत्‍म हो चुके दिखाई देते हैं। विचारधाराओं और इतिहास के अन्‍त की घोषणा हो चुकी है। किसी बड़े बदलाव की संभावनाएं खत्‍म मान ली गयी हैं। पस्‍तहिम्‍मती और निराशा पसरी हुई है। समाज के संवेदनशील हिस्‍से खासतौर पर पढ़ीलिखी जमातों में बेबसी और उससे पैदा दबा हुआ गुस्‍सा है। लेकिन क्‍या वाकई सपनों को मरा हुआ मान लिया जाये? क्‍या जिन्‍दगी एक जगह पर कदमताल कर सकती है? क्‍या बेहतर जिंदगी और बेहतर समाज के सपने देखे जाने बंद हो गये हैं?
मैं आप सब लोगों से पूछना चाहता हूं क्‍या जिंदगी हार मान सकती है, ऐसे देश में जहां 70 फीसदी बच्‍चों को ढंग का खाना तक नहीं मिल पा रहा है, जहां मरने वाले बच्‍चों में से आधे भूख और कुपोषण से मर जाते हों। जहां दुनिया के भूखे लोगों के एक चौथाई रहते हों, ऐसे देश में जहां हजारों किसान आत्‍महत्‍याएं कर रहे हैं, जहां शहरों में मजदूर काम न मिलने पर अकेले या परिवार के साथ सामूहिक आत्‍महत्‍याएं कर रहा है। जहां 1 लाख औरतें हर साल दवा-इलाज के बिना मर जाती हैं, जहां 20 करोड़ नौजवान बेरोजगार घूम रहे हों, जहां एमए बीए पास करके फैक्‍ट्री में हैल्‍परी करने वाले लड़कों की संख्‍या बढ़ती जा रही हो, जहां अच्‍छी शिक्षा नोटों की गड्डियां देकर खरीदी-बेची जा रही हो। ऐसे देश में क्‍या सपने कभी मर सकते हैं जहां अस्‍पतालों में डॉक्‍टर और दवाएं नहीं हैं, लेकिन बगल के प्राईवेट अस्‍पताल में डॉक्‍टर कहलाने वाले गिद्ध बैठे हों, जहां गरीबों के 11,000 बच्‍चे हर साल गुम हो जाते हों और अंग-व्‍यापार, देह-व्‍यापार की भेंट चढ़ जाते हों और कुछ न हो, जहां प्‍यार करने पर लड़के-लड़की को गंडासे से काट दिया जाता हो या बिटोड़े में सुलगा दिया जाता हो, जहां हमारे इलाके का सबसे बडा गुण्‍डा एमएलए एमपी बनता हो। एक ऐसे देश में जहां 80 फीसदी लोग 20 रुपया रोजाना जीने पर मजबूर हों और कुछ लोग दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में ऊपर पहुंचते जा रहे हों।
सपने मर नहीं सकते, मुझे ऐसा लगता है वे कुछ समय के लिए ओझल हो सकते हैं, या भूलने वाले हिस्‍से में जा सकते हैं लेकिन उनकी मौत नहीं हो सकती। क्‍योंकि अगर जिन्‍दगी चल रही है तो न सपने देखे जाना बंद हो सकता है न सपनों के लिए हालातों से लड़ना...
विचारधाराओं और इतिहास के अन्‍त की बकवास करने वाले लोगों की छोडिये, क्‍या वाकई हम सपने देखना छोड़ सकते हैं....

2 comments:

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

badhiya alekh apki chiththe ka jikr mere blaag me .dhanyawaad.

bharat bhushan said...

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