Wednesday, March 18, 2009

दिल्‍ली मेट्रो की चमक के पीछे का अंधेरा- भाग 2

दिल्‍ली मेट्रो पर अपनी पिछली पोस्‍ट में मैंने इसमें चल रही गड़बडियों के बारे में बताया था। दिल्‍ली मेट्रो आज हमारे देश के विकास का प्रतीक बन चुकी है। अगर आपने गौर किया हो तो कांग्रेस के चुनाव प्रचार में दिल्‍ली मेट्रो बार-बार दिखायी पड़ती है। दिल्‍ली में रहने वाले हम लोगों को शायद इसका अहसास न हो, लेकिन दूसरे राज्‍यों से आने वाले लोग अब सिर्फ मेट्रो देखने के लिए ही इसमें सफर करते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि दिल्‍ली मेट्रो उस दिशा में जाने का प्रस्‍थान-बिंदु है जिस दिशा में हमारा देश और समाज आने वाले सालों में बड़ी तेजी से आगे बढ़ने वाला है। इसीलिए दिल्‍ली मेट्रो की कार्यप्रणाली आने वाले समय का आईना भी हैं। इसीलिए यह देखना जरूरी है कि दिल्‍ली मेट्रो चलती कैसे है। वैसे पूछा जायेगा तो गर्दन अकड़ाते हुए बड़े गर्व से सरकार और मेट्रो के अफसर कहेंगे उन्‍हीं के दम पर चलती है। वो दिन-रात एसी रूम में बैठ कर लोगों से काम करवाने का ''काम'' जो करते हैं।
लेकिन असल में इसे चलाते हैं दिनों-रात इसके संगमरमरी फर्श को चमकाने वाले दिहाड़ी पर रखे जाने वाले नौजवान मजदूर या निर्माण स्‍थलों पर लगे प्रवासी मजदूर। बेहद सख्‍त नियम-कानूनों की नौकरी के बदले में उन्‍हें तनख्‍वाह मिलती है किसी को 1,800 रुपये तो किसी को 2,200 रुपये। ज्‍यादातर लोगों को हफ्ते में एक दिन की छुट्टी भी नहीं मिलती है। इसके अलावा ऊपर से दिखने वाले कारपोरेट कल्‍चर और बढ़ि‍या ड्रेस के पीछे की सच्‍चाई यह है कि जरा-जरा सी बातों पर कामगारों से गाली-गलौज और मारपीट आम बात है। सफाई का ठेका लेने वाली हाऊसकीपिंग कंपनियों ने ज्‍यादातर गुंडे पाले हुए हैं। जो हर तरह से धमकाना-डराना जानते हैं।
फिलहाल यह मामला तब सामने आया जब कुछ नौजवान सफाईकर्मियों ने इस गुंडागर्दी और नाइंसाफी का विरोध किया। इन नौजवान सफाईकर्मियों ने दिल्‍ली सरकार द्वारा निर्धारित न्‍यूनतम मजदूरी यानी 186 रुपये की मांग की। नतीजा वही गाली-गलौज, डांट-डपट और हाथापाई तक की नौबत भी आयी। लेकिन इन नौजवानों ने हार नहीं मानी और डीएमआरसी के सीईओ श्रीधरन से लेकर श्रम कार्यालय तक का दरवाजा खटखटाया। दुनिया भर में दिल्‍ली मेट्रो का श्रेय लेकर शान से घूमने वाले महान इंजीनियर साहब से मदद तो क्‍या कोई जवाब या मिलने तक का समय नहीं मिला। इसके बाद इन लोगों ने मेट्रो कामगार संघर्ष समिति बनाकर अपनी लड़ाई लड़नी शुरू कर दी है।
इस समिति के बनने से बौखलाये मेट्रो प्रबंधन ने एक सकुर्लर जारी कर दिया है। जो पहली नजर में ही मौलिक अधिकारों के खिलाफ और फासीवादी तानाशाही की छाप छोड़ता है। इसमें मजदूरों को चेतावनी देते हुए किसी भी शिकायत के खिलाफ न्‍यायालय और मीडिया जाने की सख्‍त मनाही की गयी है। इसमें मेट्रो के प्रबंधन के खिलाफ शिकायत प्रबंधन से ही करने की अजीबोगरीब सलाह दी गयी है। इसमें श्रीधरन साहब ने मजदूरों के व्‍यक्तिगत जीवन के बारे में भी कुछ नैतिक उपदेश दिये हैं।
पहली बात तो यह कि हर मजदूर पहले एक नागरिक भी है। और मेट्रो में काम करने की वजह से उसका न्‍यायालय में जाने का अधिकार छीना नहीं जा सकता। क्‍या मेट्रो न्‍यायालय से ऊपर का निकाय होने की बात कर रहा है? दूसरे तमाम श्रम कानूनों को लागू करवाने के लिए अन्‍य एजेंसियां हैं। मेट्रो का यह सकुर्लर उन एजेंसियों के अस्तित्‍व पर ही सवालिया निशान खड़ा कर देता है।
कुल मिलाकर यह सिर्फ एक बानगी है। समाज के एक छोटे तबके की सुख-सुविधाओं को बहुसंख्‍यक तबके की कीमत पर खड़ा किया जा रहा है। अपनी मेहनत से चंद मिनटों में शान से होने वाले आरामदायक सफर को संभव बनाने वाले इन लोगों की खुद की जिंदगी की गाड़ी घिसट रही है। इस बहुसंख्‍यक तबके की आवाज सुनने की फुर्सत न तो न सरकार के पास है न न्‍यायालय के पास और न मीडिया के पास है। 20 फीसदी लोगों की सेवा के लिए 80 फीसदी लोगों को गुलामों की तरह काम पर लगा दिया गया है। क्‍या आपको रोम के गुलामों की बात ध्‍यान आ रही है। कहते हैं कि हर दौर के विशाल निर्माण उस दौर की पूरी कहानी कह देते हैं। ये विशाल निर्माणकार्य उस दौर के समाजों की तस्‍वीर भी पेश करते हैं। मिस्र के पिरामिड बनाने वाले गुलामों को जिन्‍दा ही पिरामिड में दफना दिया जाता था। ताजमहल बनाने वाले मजदूरों को मारा नहीं गया सिर्फ उनके हाथ काट लिये गये। आज मेट्रो के मजदूरों को न मारा जा रहा है न उनके हाथ काटे जा रहे हैं, उन्‍हें बेबस कर दिया गया है। जिन्‍दा रहना है तो गुलामों की तरह काम करो वरना... मेट्रो के मजदूरों की हालत सिर्फ झलक है। ये दायरा मजदूरों तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले समय में तमाम कानूनों को ताक पर रखकर काम करने वाले लोगों को निचोड़ा जाना तय है। चाहे वे मजदूर हों, मल्‍टीनेशनल के टाई वाले कर्मचारी हों आम पत्रकार हों या अध्‍यापक हों। हर जगह मुनाफे का इंजेक्‍शन काम करने वालों के खून की आखिरी बूंद तक निकाल लेने के लिए चाक-चौबन्‍द हो जाएगा। सवाल यह है कि हम अपनी बारी का इंतजार करें या आज से ही आवाज उठाना शुरू कर दें...
(मेट्रो के इन नौजवान बहादुर सफाईकर्मियों की लड़ाई को व्‍यापक समर्थन मिलना शुरू हो गया है। देशभर के कई इंसाफपसंद संगठनों और व्‍यक्तियों ने मिलकर मेट्रो कर्मी अधिकार रक्षा मंच (In Defence of Metro Workers' Rights - idmwr-h.blogspot.com) बनाया है। लोगों के जनवादी और मौलिक अधिकारों को बचाने के लिए तमाम जागरूक लोगों को इन सफाईकर्मियों का साथ देने के लिए आगे आना चाहिए।)