ककहरा
‘ क ‘ से काम कर ,
‘ ख ‘ से खा मत ,
‘ ग ‘ से गीत सुना ,
‘ घ ‘ से घर की बात न करना , ङ खाली ।
सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !
‘ च ‘ को सौंप चटाई ,
‘ छ ‘ ने छल छाया ,
‘ ज ‘ जंगल ने , ‘ झ ‘ का झण्डा फहराया ,
झगड़े ने ञ बीचोबीच दबा डाली ,
सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !
‘ ट ‘ टूटे , ‘ ठ ‘ ठिटके ,
यूँ ‘ ड ‘ डरा गया ,
‘ ढ ‘ की ढपली हम ,
जो आया , बजा गया ।
आगे कभी न आई ‘ ण ‘ पीछे वाली,
सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !
फिर समूचा एक दिन बीता
फिर समूचा एक दिन बीता
रह गया आधा-अधूरा आदमी रीता
रोटियाँ-रुजगार
भागमभाग
झिड़कियाँ-झौं-झौं कई खटराग
हर समय हर पल लहू पीता
बंद कमरों में
खुला आकाश
वाह ! क्या जीदारियत, शाबाश
बहस का मैदान तो जीता
कारखाने-खेत औ'
फुटपाथ
हाथ सबके साथ कितने हाथ
कह रही कुछ और भी गीता !
(रचनाकाल : 28.01.1979)
अगर हम
न छल होता न प्रपंच
न स्वार्थ होता न मंच
न चादर होती न दाग़
न फूस होता न आग
न प्राण होते न प्रण
न देह होती न व्रण
न दुष्ट होते न नेक
न अलग होते न एक
न शहर होते न गाँव
न धूप होती न छाँव
अगर हम जानवर होते
सोच
सोच रहा हूँ
सोचना बंद कर दूँ
और सुखी रहूँ !
5 comments:
गज़ब की कविताएं...
सहज...सरल...यही ताकत है कृषक जी की...
शानदार कविताओं की शानदार प्रस्तुति।
साथियो, आभार !!
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स्नेहिल
आपका
शहरोज़
बहुत संन्दर कवितायें हैं आदरणीय कृषक जी की. इन्हें प्रस्तुत करने के लिए आपका आभार.
bahut badiya...
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